सुबह का व्यस्त समय, मैं अपना रोज की तरह अपने दैनिक कार्य को निपटाने में व्यस्त हुँ, नहाना, पूजा – पाठ करना, सबका लन्च बाॅक्स तैयार करना और फिर बच्चों को स्कूल भेजने और इनके आॅफिस जाने के बाद स्वयं को स्कूल जाने के लिए तैयार करना। रोज मैं सुबह आठ बजे अपना घर छोड़ देती हुँ, जैसे ही दस कदम आगे बढ़ती हुँ एक चित परिचित आवाज़ मुझे सुनाई देती है —“राम-राम मैडम जी। ” यह आवाज़ सुन कर ऎसा लगता है मानो एक साथ बिन मांगे आशीर्वाद की बारिश हो गई हो। यह सिलसिला रोज का है, मैं भूल जाती हुँ लेकिन वो अम्मा” राम – राम “कहना नहीं भूलती। मुझे भी कहीं ना कहीं उनकी आदत- सी हो गई थी, किंतु आज पांच दिन हो गए, न मुझे वो अम्मा दिखाई दे रही थी न उनकी वो चित परिचित आवाज़! मेरा मन बैचैन हो उठा और मैं सोचने लगी कि” आखिर क्या हुआ होगा?कुछ अनर्थ! नहीं नहीं, मुझे ऐसा नहीं सोचना चाहिए। ईश्वर करे वह स्वस्थ हो। ” फिर भी मुझे से रहा नहीं गया और मैंने आस – पास के लोगों से पूछताछ की तो जिसकी आशंका थी वही हुआ। उनका देहांत हो गया था, यह खबर सुनकर मैं जड़वत हो गई। मानो जैसे कि किसी ने मुझे से सब कुछ छिन लिया हो, मन एक दम उदास हो गया लेकिन प्रकृति और उसके कार्य कहाँ रूकते है, फिर वही दैनिक कार्यों को निपटाकर मैं अपनी मंजिल की ओर चल पड़ी और जैसे ही दस कदम आगे बढ़ी तो ऐसा लगा जैसे किसी ने मुझे रोक कर कहा “राम – राम मैडम जी।”
🙏राम – राम 🙏
Published by Vandana Vaidehi
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