👍लॉकडाउन की संतुष्टि 👍

आज बहुत दिनों के बाद शर्मा जी के घर की खिड़की खुली दिखी, शर्मा जी हमारे कॉलोनी के सबसे वृद्ध , सज्जन व व्यवहार कुशल व्यक्ति हैं। दूसरो की सहायता करने के लिए सदैव तत्पर रहना तो जैसे उनके व्यक्तित्व की छाप हैं। उनका घर हमारे घर से छठवें नम्बर पर हैं, उनके परिवार में वो, उनका बेटा (अतुल), बेटी (मान्वी) हैं । दुख की बात अभी तीन साल पहले ही श्रीमती शर्मा का देहांत हो चुका हैं। अतुल भी शादी के बाद नौयडा में जाकर बस गया, बेटी मान्वी भी अपने पति और बच्चों को साथ सुखी जीवन व्यतीत कर रही हैं। अब इस घर में शर्मा जी के अलावा कोई नहीं हैं। जब से उनके परिवार का मंथन हुआ तब से उन्होंने भी अपने आप को उस घर के किसी कोने में खुद को कैद कर लिया। बाहर की रोशनी को जैसे घर के अंदर दस्तक देने की अनुमति नहीं हैं। मानो घर के अंदर अंधेरे का साम्राज्य हैं। वो कब घर से बाहर निकलते व अंदर जाते किसी ने नहीं देखा था। हर वक्त मस्त-मोला रहने वाले शर्मा जो कहीं उदासी के असीम साए में खो गए थे। लेकिन आज महिनों के बाद खिड़की – दरवाजे खुले दिखे, ऎसा लगा जैसे शर्मा जी के घर ने गहरी साँस ली। लगता है खुशखबरी है क्योंकि महिनों बाद घर में साफ – सफाई करने की चहल कदमों की आवाज़ आ रही हैं और साथ ही साथ “ये सामान वहाँ रखो” “उसको वैसे रखना ” ” आज खाने में फलाना – फलाना बनाना ” के शब्द सुनाई दे रहे हैं, फिर मैंने जिज्ञासावश जानने की कोशिश की तो मालूम हुआ आज उनके बेटे – बहू और पोते आने वाले हैं। मैं उनकी खुशी का रहस्य समझ गयी।

शाम के पाँच बजे अचानक एक कार आकर रुकी, देखा तो अतुल अपनी पत्नी व बच्चों के साथ आ चुका हैं। हंसने व खिलखिलाने की आवाज़ से घर के साथ – साथ शर्मा जी में भी जान आ गई। अगले दिन चाय-नाश्ते के बाद अतुल ने कहा “पापा, यह कुछ कागज़ात हैं , इन पर साइन कर दीजिए। वैसे भी हम आपको लेने आए हैं , अब आप अकेले नहीं रहेगे। ” शर्मा जी ने जैसे ही कागजों को पड़ा वह नि:शब्द हो गए। ” यह क्या ? यह तो मकान बेचने के कागज़ात हैं।” शर्मा जी के आखों के आगे अंधेरा छा गया, वह मौन हो गए। उनको मौन देखते ही अतुल ने समझाते हुए बोला “पापा, वैसे भी माँ के जाने के बाद से अब तक आप अकेले ही रह रहे हो और लॉकडाउन के कारण वैसे भी आना – जाना नहीं हो रहा हैं। मैं बहुत मुश्किल से आया हूँ। सोच रहा हूँ सब कुछ फाइनल करके ही जाऊँ।” लेकिन शर्मा जी जैसे कुछ सुन ही नहीं रहे थे। उन्हें घर और घर में बसी यादे जो कि उनके जीने का सहारा थी, उससे कैसे दूर हो जाएगे। घर के हर एक कोने में बच्चों का बचपन और पत्नी के साथ बिताए पलों का अहसास था। “इन यादों को मैं कैसे बेच सकता हूँ? नहीं-नहीं-नहीं। ” शर्मा जी जोर से चिल्लाये। “मैं ये घर नहीं बेंचूगा, इस घर को छोड़कर नहीं जाऊंगा। लॉकडाउन बाहर शहर में हुआ है मेरी अंतर आत्मा में नहीं। ” अतुल समझ गया कि पापा नहीं जाएंगे तो उसने भी जिद नहीं की और थोड़े दिन खुशी से रहकर वह अपने परिवार के साथ नौयडा चला गया। जब शर्मा जी अतुल को विदाई दे रहे थे तो उनके मुख पर अतुल के जाने का दुख नहीं बल्कि एक संतुष्टि थी कि उनके बेटे ने उन्हें अपनी मिठी यादों के साथ उन्हें उस घर में लॉकडाउन रहने की अनुमति दे दी। फिर उस दिन के बाद से शर्मा जी के घर के खिड़की – दरवाजे खुल गए। मानो उन्होंने भी बाहर की रोशनी को अंदर आने की अनुमति दे दी।

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