लेफ्टिनेंट दयाल के घर को कौन नहीं जानता। उन्होंने जो हासिल किया वो सबके नसीब में नहीं होता। जी हाँ लेफ्टिनेंट दयाल जो कि आर्मी में लेफ्टिनेंट थे, स्वभाव से आर्मी जैसा कड़कपन और देश के लिए कुछ कर गुजरने का जूनून। उनके परिवार में उनकी पत्नी श्रीमती दयाल और एक इकलौता बेटा (समर्थ) था। परिवार के सभी सदस्यों में देश के लिए कुछ कर गुजरने का जैसै जूनून था। शायद ऊपर वाले ने भी जल्दी सुन ली और देश पर बलिदान होने का गौरव जल्दी मिल गया। उन्होंने अपने तरह अपने बेटे को भी आर्मी क्षेत्र दिया और वो भी एक ऊंचे ओहदे पर पहुंच गया। लेकिन वो कहते हैं न सुख आता है तो चारों तरफ से और दुख आता है तो चारों तरफ से। श्रीमती दयाल अभी इस दुख से उबर भी नहीं पाई थी कि उन्हें अपने बेटे के बलिदान ने अंदर तक झकझोर कर रख दिया। वो शाम आज भी याद है मुझे, जब मिस्टर दयाल के मृत शरीर के पास वो बैठी थी किन्तु एक भी आंसू उन्होंने नहीं बहाया ठीक उसी तरह वो अपने बेटे के अंतिम दर्शन में भी इसी तरह मूक अवस्था में बैठी थी। हमने बहुत कोशिश की कि की वो रोकर अपने आप को हल्का कर ले। लेकिन हमारी कोशिशों ने भी जवाब दे दिया। आज इस बात को दो महीने से ऊपर हो गया है, श्रीमती दयाल ने अपने आप को घर में कैद कर लिया है , उनसे बात – चीत भी अब ना के बराबर होती है। लेकिन मेरा मन नहीं माना और उनसे मिलने का मन मैंने आज बना लिया। दरवाजा खटखटाया, उन्होंने ने दरवाजा खोला और चित – परिचित हंसी से मेरा स्वागत किया फिर मेरा हाल – चाल पूछा। उस समय किचन में वह चाय बना रही थी और उन्होंने बोला, “सुधा चाय पीकर ही जाना।” उन्होंने क्या कहा मैंने नहीं सुना क्योंकि मेरी निगाहें तो उन कैनवास पर बनी तस्वीरों पर थी जो कपड़ों से ढंकी थी। मेरा मन उत्सुकता के सागर में गोते लगा रहा था कि अचानक श्रीमती दयाल ने उन तस्वीरों पर ढंके कपड़ों को हटा दिया। जैसे ही मैंने उन तस्वीरों को देखा, मैं देखती रह गई, जैसे हर तस्वीर कुछ बोल रही है। उन तस्वीरों में उन्होंने मिस्टर दयाल और अपने बेटे के साथ बिताए एक – एक पल को रंगो से सजा दिया। वह तस्वीरें नहीं बल्कि उनकी यादें हैं जिसको उन्होंने रंगों के द्वारा कैनवास पर बिखेर दिया। मुझे समझते देर नहीं लगी, जो आंसू उस समय नहीं निकले वो आंसू आज रंगों के रूप में चित्र बनकर अपनी कहानी कह रहे हैं। इतने में श्रीमती दयाल चाय लेकर आ गई। मैंने चाय पी और चुपचाप बिना कुछ कहे आ गयी और सोच रही थी श्रीमती दयाल अकेली कहाँ हैं, वो तो आज भी अपने पति और बेटे के साथ हैं कैनवास पर बिखरे रंगों के रूप में।
कैनवास के रंग
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Published by Vandana Vaidehi
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