परछाई

जीवन के मेले में जब अपने आप को अकेले तन्हा पाती हूँ, उस समय अपनी परछाई को साथ पाती हूँ। परछाई मेरी सहेली है, सखी है, मेरी हमजोली है, मेरे हर सुख, दुख की हिस्सेदार, मेरा प्यारा वजूद जो मेरा अस्तित्व है। एक दिन मैंने परछाई से पूछा, “सब साथ छोड़ देते हैं पर तुम नहीं, क्यों??” इस पर परछाई थोड़ा गंभीर हुई और बोली, “सखी तुम इस आशा में न रहना की मैं तुम्हारे साथ हूँ। क्योंकि मेरा ग्रहण अंधेरा हैं इसलिए जब अंधेरा गंभीर हो जाता है मेरा वजूद भी खत्म हो जाता है, इसलिए मेरा भरोसा न करना।जिंदगी में जब अंधेरा छाएगा, मैं साथ न दूंगी। तुम्हें स्वयं अंधेरे से अकेले ही सामना करना होगा क्योंकि अंधेरे में परछाई भी साथ छोड़ देती है!!!!!!”

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