बेटी की व्यथा

क्यों फेंक देते हो कूडे पर मुझे क्या बिगाडा है मैने तुम्हारा। रोशनी हूँ तुम्हारे घर की मुझसे है वजूद तुम्हारा। हर पल साथ देती हूं तुम्हारा कभी मां तो कभी बहन तो कभी पत्नी बनकर क्यों भूल जाते हो हमेशा यह बलिदान मेंरा। जिदंगी सवांरती हूं मैं जिंदगी को आगे बढाती हूं मैं क्यों भूल जाते हो मुझसे है अस्तित्व तुम्हारा। अगर इसी तरह मुझे कूडे पर फेंकते जाओगे तो सोचो अपने लिए मां बहन और पत्नी कहाँ से लाओगे। क्यों मैं तुम सब पर भारी हूं मैं भी तो घर की राजदुलारी हूं क्यों नहीं आती समझ तुम्हारे क्यो फेक देते हो कूडे पर मुझे क्या बिगाडा है मैने तुम्हारा।

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