क्यों फेंक देते हो कूडे पर मुझे क्या बिगाडा है मैने तुम्हारा। रोशनी हूँ तुम्हारे घर की मुझसे है वजूद तुम्हारा। हर पल साथ देती हूं तुम्हारा कभी मां तो कभी बहन तो कभी पत्नी बनकर क्यों भूल जाते हो हमेशा यह बलिदान मेंरा। जिदंगी सवांरती हूं मैं जिंदगी को आगे बढाती हूं मैं क्यों भूल जाते हो मुझसे है अस्तित्व तुम्हारा। अगर इसी तरह मुझे कूडे पर फेंकते जाओगे तो सोचो अपने लिए मां बहन और पत्नी कहाँ से लाओगे। क्यों मैं तुम सब पर भारी हूं मैं भी तो घर की राजदुलारी हूं क्यों नहीं आती समझ तुम्हारे क्यो फेक देते हो कूडे पर मुझे क्या बिगाडा है मैने तुम्हारा।
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परछाई
जीवन के मेले में जब अपने आप को अकेले तन्हा पाती हूँ, उस समय अपनी परछाई को साथ पाती हूँ। परछाई मेरी सहेली है, सखी है, मेरी हमजोली है, मेरे हर सुख, दुख की हिस्सेदार, मेरा प्यारा वजूद जो मेरा अस्तित्व है। एक दिन मैंने परछाई से पूछा, “सब साथ छोड़ देते हैं पर तुम नहीं, क्यों??” इस पर परछाई थोड़ा गंभीर हुई और बोली, “सखी तुम इस आशा में न रहना की मैं तुम्हारे साथ हूँ। क्योंकि मेरा ग्रहण अंधेरा हैं इसलिए जब अंधेरा गंभीर हो जाता है मेरा वजूद भी खत्म हो जाता है, इसलिए मेरा भरोसा न करना।जिंदगी में जब अंधेरा छाएगा, मैं साथ न दूंगी। तुम्हें स्वयं अंधेरे से अकेले ही सामना करना होगा क्योंकि अंधेरे में परछाई भी साथ छोड़ देती है!!!!!!”
??? कौन है ये चार लोग???
जब भी हम कोई नयी शुरुआत करते हैं तो ज़रूरी नहीं सब आपका साथ दे, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो आपका मनोबल गिराने के लिए खङे रहते हैं और उनका जुमला होता है, “यार तुम ये करोगे तो चार लोग क्या कहेंगे।” जी हाँ, ये चार लोग जिनका न अता है न पता है, पता नहीं कहाँ से आते हैं और कहाँ चले जाते हैं लेकिन बराबर हमारे साथ रहते हैं हमारी परछाई बनकर। इन चार लोगों ने ठेका लिया है लोगों का आत्मविश्वास कम करना, मनोबल गिराना, पिछे हटने की सीख देना, ज्ञानी होते हुए भी अज्ञानी बने रहना। हमें से अधिकतर लोग इन चार लोगों की ज्यादा फिक्र करते हैं तभी तो आज जो जहां है वहीं पर ही नज़र आते हैं और जो लोग इनकी परवाह नहीं करते हैं वो आसमान छूते हैं। दोस्तों ये चार लोग वो बदनुमा दाग़ हैं जो किसी एरियल डिटर्जेंट से नहीं ढुलने वाला है, कहीं न कहीं ये समाज की वो जङ है जिसने समाज को चलाने का ठेका लिया हुआ है। एक तो परेशानी भी यह है कि हम इन चार लोगों की शिकायत भी नहीं कर सकते, कहाँ करोगे जनाब, जब कोई ऐसा पुलिसथाना ही नहीं बना जिसके कारण ये चार लोग दिन-प्रतिदिन शक्तिशाली होते जा रहे हैं। लेकिन यह भी सच है दोस्तों की इन चार लोगों से लड़ने का जज्बा आप अपने ही अंदर पैदा कर सकते हैं। जब हर व्यक्ति इन चार लोगों का सामना करना सीख जाएगा समझिए वो टाटा बिरला और अंबानी बन जाएगा, हो सकता है इस देश का प्रधानमंत्री ही बन जाए। आज से ही आगे बढ़िये और इन चार लोगों का वज़ूद खत्म कर दिजीए। मैंने तो ठान लिया है और आपने…………………………………………..!!!!!!
✍️वक्त को गुज़र जाने दो✍️
वक्त गुज़रता है, वक्त को गुज़र जाने दो क्योंकि हर गुज़रा वक्त नया वक्त लेकर आता है, इस नये वक्त के साथ मुझे रम जाने दो, वक्त गुज़रता है, वक्त को गुज़र जाने दो।
गया वक्त, कुछ लेकर गया, कुछ देकर गया, क्या खोया क्या पाया मैंने, इसका हिसाब मुझे इस नये वक्त से करने दो, वक्त गुज़रता है, वक्त को गुज़र जाने दो।
इस नये वक्त को मुझे अपनी मेहनत से सजाना है, सँवारना है, खुशियों में चार – चांद लगाना है, यह पुराना न हो जाए, उससे पहले मुझे इसे जी लेने दो, वक्त गुज़रता है, वक्त को गुज़र जाने दो।
✍️ कैद में हैं बुलबुल ✍️
कैद में हैं बुलबुल, आज उसको उड़ने दो नीले आसमान की ऊंचाईयों को उसे छूने दो माना पंख हो गए कमजोर, आज उड़ना भूल गए हैं लेकिन आत्मविश्वास के पंख लेकर आज उसको उड़ने दो कैद में हैं बुलबुल, आज उसको उड़ने दो पिंजरे से बाहर निकल, वह थोड़ा सकुचाएगी, घबराएगी, डर जाएगी निडरता का पाठ पढ़ाकर आज उसे उड़ जाने दो कैद में हैं बुलबुल, आज उसको उड़ जाने दो आसमान की गहराईयों में जब वो खो जाएगी तो शायद वो अपना वजूद पा जाएगी अपना वजूद पाने का हक आज उसे मिल जाने दो कैद में हैं बुलबुल, आज उसको उड़ जाने दो।।
कैनवास के रंग
लेफ्टिनेंट दयाल के घर को कौन नहीं जानता। उन्होंने जो हासिल किया वो सबके नसीब में नहीं होता। जी हाँ लेफ्टिनेंट दयाल जो कि आर्मी में लेफ्टिनेंट थे, स्वभाव से आर्मी जैसा कड़कपन और देश के लिए कुछ कर गुजरने का जूनून। उनके परिवार में उनकी पत्नी श्रीमती दयाल और एक इकलौता बेटा (समर्थ) था। परिवार के सभी सदस्यों में देश के लिए कुछ कर गुजरने का जैसै जूनून था। शायद ऊपर वाले ने भी जल्दी सुन ली और देश पर बलिदान होने का गौरव जल्दी मिल गया। उन्होंने अपने तरह अपने बेटे को भी आर्मी क्षेत्र दिया और वो भी एक ऊंचे ओहदे पर पहुंच गया। लेकिन वो कहते हैं न सुख आता है तो चारों तरफ से और दुख आता है तो चारों तरफ से। श्रीमती दयाल अभी इस दुख से उबर भी नहीं पाई थी कि उन्हें अपने बेटे के बलिदान ने अंदर तक झकझोर कर रख दिया। वो शाम आज भी याद है मुझे, जब मिस्टर दयाल के मृत शरीर के पास वो बैठी थी किन्तु एक भी आंसू उन्होंने नहीं बहाया ठीक उसी तरह वो अपने बेटे के अंतिम दर्शन में भी इसी तरह मूक अवस्था में बैठी थी। हमने बहुत कोशिश की कि की वो रोकर अपने आप को हल्का कर ले। लेकिन हमारी कोशिशों ने भी जवाब दे दिया। आज इस बात को दो महीने से ऊपर हो गया है, श्रीमती दयाल ने अपने आप को घर में कैद कर लिया है , उनसे बात – चीत भी अब ना के बराबर होती है। लेकिन मेरा मन नहीं माना और उनसे मिलने का मन मैंने आज बना लिया। दरवाजा खटखटाया, उन्होंने ने दरवाजा खोला और चित – परिचित हंसी से मेरा स्वागत किया फिर मेरा हाल – चाल पूछा। उस समय किचन में वह चाय बना रही थी और उन्होंने बोला, “सुधा चाय पीकर ही जाना।” उन्होंने क्या कहा मैंने नहीं सुना क्योंकि मेरी निगाहें तो उन कैनवास पर बनी तस्वीरों पर थी जो कपड़ों से ढंकी थी। मेरा मन उत्सुकता के सागर में गोते लगा रहा था कि अचानक श्रीमती दयाल ने उन तस्वीरों पर ढंके कपड़ों को हटा दिया। जैसे ही मैंने उन तस्वीरों को देखा, मैं देखती रह गई, जैसे हर तस्वीर कुछ बोल रही है। उन तस्वीरों में उन्होंने मिस्टर दयाल और अपने बेटे के साथ बिताए एक – एक पल को रंगो से सजा दिया। वह तस्वीरें नहीं बल्कि उनकी यादें हैं जिसको उन्होंने रंगों के द्वारा कैनवास पर बिखेर दिया। मुझे समझते देर नहीं लगी, जो आंसू उस समय नहीं निकले वो आंसू आज रंगों के रूप में चित्र बनकर अपनी कहानी कह रहे हैं। इतने में श्रीमती दयाल चाय लेकर आ गई। मैंने चाय पी और चुपचाप बिना कुछ कहे आ गयी और सोच रही थी श्रीमती दयाल अकेली कहाँ हैं, वो तो आज भी अपने पति और बेटे के साथ हैं कैनवास पर बिखरे रंगों के रूप में।
❣️ऐ जिन्दगी खुश हो जा।। ❣️
ऐ जिन्दगी खुश हो जा, मैंने जीना सीख लिया, क्योंकि मैंने रोते – रोते हँसकर जीना सीख लिया।
जिन्दगी तू दे चाहे जितने भी जख्म मुझे परवाह नहीं, क्योंकि मैंने उन जख्मों पर मरहम रखना सीख लिया। ऐ जिन्दगी खुश हो जा, मैंने जीना सीख लिया।।
जिन्दगी तूने मजबूर किया मुझे अंगारों पर चलने के लिए, मुझे परवाह नहीं क्योंकि उन अंगारों से मिलने वाले छालों को छलना मैंने सीख लिया। ऐ जिन्दगी खुश हो जा, मैंने जीना सीख लिया।।
जिन्दगी तूने मुझे राह दी काँटों भरी, लेकिन मुझे परवाह नहीं, क्योंकि उन काँटों को कष्ट देना मैंने सीख लिया। ऐ जिन्दगी खुश हो जा, मैंने जीना सीख लिया।।
मौत भी आ जाए ग़र मुझे परवाह नहीं, क्योंकि मैंने मर – मर कर जीना सीख लिया। ऐ जिन्दगी खुश हो जा, मैंने जीना सीख लिया। मैंने जीना सीख लिया।।
टैक्नोलॉजी
विद्या हमारे घर पर वर्षों से काम कर रही हैं, जैसा नाम वैसा काम। घर के हर काम बखूबी ईमानदारी से करती हैं। मैं तो उसे अपनी घर की सदस्य की तरह ही समझती हूं। घर के काम तो ठीक है, वह अपने दुख – दर्द को भी हमारे साथ साझा करती हैं और हमारे घर की हर परेशानी में आगे खड़ी रहती हैं। विद्या का नाम विद्या तो था पर स्कूल का मुहँ कभी नहीं देखा था। वह पढ़ना – लिखना बिलकुल नहीं जानती थी। अगले दो महीने तक मैंने उसे काम पर आने के लिए मना कर दिया, मेरे मना करने से पहले ही उसने कहा “दिदि” “इम्फक्शन” का डर है, हमें सावधानी रखनी है इसलिए मैं दो महीने काम पर नहीं आऊँगी। ” पहले तो मैंने कहा” विद्या “इम्फक्शन” नहीं “इन्फेक्शन” होता है पगली, और मुझे खुशी है विद्या की तुम इतनी जागरूक हो। “लेकिन मुझे मन – ही – मन अफसोस होता था उसके अनपढ़ होने का, की काश विद्या पढ़ी – लिखी होती।
एक – दो महीने कब निकल गए मालूम ही नहीं चला। जब वो काम पर वापस आई तो कुछ दुखी नज़र आ रही थी और वह अभी कुछ दिनों से अपने साथ अपने बेटे को भी ला रही थी, मैंने आश्चर्य से पूछा “यह क्या विद्या?? इसकी पढ़ाई का नुकसान नहीं हो रहा हैं।” पहले तो वह कुछ नहीं बोली किंतु थोड़ी देर चुप रह कर………. “दिदि नुकसान तो हो रहा है लेकिन न मुझे मोबाइल चलाना आता न इसके पापा को। पढ़ाई कैसे हो?? आप तो जानती है आजकल मोबाइल से ही बच्चों की पढ़ाई हो रही हैं और मैं ही नहीं दिदि हमारे मोहल्ले में और भी कई बहने हैं जिनके पास मोबाइल तो हैं लेकिन उन्हें चलाना नहीं आता है, उनके बच्चों का भी भारी नुकसान हो रहा है। “विद्या की बात सुनकर मुझे लगा कि हमने टैक्नोलॉजी का तो आविष्कार कर लिया किंतु कही – न-कही उन निम्न वर्गो को छोड़ दिया जो अशिक्षित है। जो मोबाइल तो खरीद सकते हैं परंतु समय आने पर उसका उपयोग कैसे करें? वे नहीं जानते। फिर मैंने निश्चय किया कि सभी महिलाओं को शिक्षित करने का। विद्या के साथ – साथ मैने उन महिलाओं को शिक्षा और नयी – नयी टैक्नोलॉजी के बारे में बताया और यह भी बताया कि खुद किस तरह अॉनलाइन पढ़ाई अपने बच्चों की करवा सकती हैं। कुछ समय बाद विद्या ने बताया कि उसका बेटा अच्छे अंको से पास हो गया है। उसके चेहरे की खुशी देखकर मुझे लगा कि यह खुशी उन सभी निम्न अशिक्षित वर्गो को मिलना चाहिए जो इसके हकदार हैं। मैंने तो कोशिश की, आप भी करिये, करेंगे ना…..!!!!
👍लॉकडाउन की संतुष्टि 👍
आज बहुत दिनों के बाद शर्मा जी के घर की खिड़की खुली दिखी, शर्मा जी हमारे कॉलोनी के सबसे वृद्ध , सज्जन व व्यवहार कुशल व्यक्ति हैं। दूसरो की सहायता करने के लिए सदैव तत्पर रहना तो जैसे उनके व्यक्तित्व की छाप हैं। उनका घर हमारे घर से छठवें नम्बर पर हैं, उनके परिवार में वो, उनका बेटा (अतुल), बेटी (मान्वी) हैं । दुख की बात अभी तीन साल पहले ही श्रीमती शर्मा का देहांत हो चुका हैं। अतुल भी शादी के बाद नौयडा में जाकर बस गया, बेटी मान्वी भी अपने पति और बच्चों को साथ सुखी जीवन व्यतीत कर रही हैं। अब इस घर में शर्मा जी के अलावा कोई नहीं हैं। जब से उनके परिवार का मंथन हुआ तब से उन्होंने भी अपने आप को उस घर के किसी कोने में खुद को कैद कर लिया। बाहर की रोशनी को जैसे घर के अंदर दस्तक देने की अनुमति नहीं हैं। मानो घर के अंदर अंधेरे का साम्राज्य हैं। वो कब घर से बाहर निकलते व अंदर जाते किसी ने नहीं देखा था। हर वक्त मस्त-मोला रहने वाले शर्मा जो कहीं उदासी के असीम साए में खो गए थे। लेकिन आज महिनों के बाद खिड़की – दरवाजे खुले दिखे, ऎसा लगा जैसे शर्मा जी के घर ने गहरी साँस ली। लगता है खुशखबरी है क्योंकि महिनों बाद घर में साफ – सफाई करने की चहल कदमों की आवाज़ आ रही हैं और साथ ही साथ “ये सामान वहाँ रखो” “उसको वैसे रखना ” ” आज खाने में फलाना – फलाना बनाना ” के शब्द सुनाई दे रहे हैं, फिर मैंने जिज्ञासावश जानने की कोशिश की तो मालूम हुआ आज उनके बेटे – बहू और पोते आने वाले हैं। मैं उनकी खुशी का रहस्य समझ गयी।
शाम के पाँच बजे अचानक एक कार आकर रुकी, देखा तो अतुल अपनी पत्नी व बच्चों के साथ आ चुका हैं। हंसने व खिलखिलाने की आवाज़ से घर के साथ – साथ शर्मा जी में भी जान आ गई। अगले दिन चाय-नाश्ते के बाद अतुल ने कहा “पापा, यह कुछ कागज़ात हैं , इन पर साइन कर दीजिए। वैसे भी हम आपको लेने आए हैं , अब आप अकेले नहीं रहेगे। ” शर्मा जी ने जैसे ही कागजों को पड़ा वह नि:शब्द हो गए। ” यह क्या ? यह तो मकान बेचने के कागज़ात हैं।” शर्मा जी के आखों के आगे अंधेरा छा गया, वह मौन हो गए। उनको मौन देखते ही अतुल ने समझाते हुए बोला “पापा, वैसे भी माँ के जाने के बाद से अब तक आप अकेले ही रह रहे हो और लॉकडाउन के कारण वैसे भी आना – जाना नहीं हो रहा हैं। मैं बहुत मुश्किल से आया हूँ। सोच रहा हूँ सब कुछ फाइनल करके ही जाऊँ।” लेकिन शर्मा जी जैसे कुछ सुन ही नहीं रहे थे। उन्हें घर और घर में बसी यादे जो कि उनके जीने का सहारा थी, उससे कैसे दूर हो जाएगे। घर के हर एक कोने में बच्चों का बचपन और पत्नी के साथ बिताए पलों का अहसास था। “इन यादों को मैं कैसे बेच सकता हूँ? नहीं-नहीं-नहीं। ” शर्मा जी जोर से चिल्लाये। “मैं ये घर नहीं बेंचूगा, इस घर को छोड़कर नहीं जाऊंगा। लॉकडाउन बाहर शहर में हुआ है मेरी अंतर आत्मा में नहीं। ” अतुल समझ गया कि पापा नहीं जाएंगे तो उसने भी जिद नहीं की और थोड़े दिन खुशी से रहकर वह अपने परिवार के साथ नौयडा चला गया। जब शर्मा जी अतुल को विदाई दे रहे थे तो उनके मुख पर अतुल के जाने का दुख नहीं बल्कि एक संतुष्टि थी कि उनके बेटे ने उन्हें अपनी मिठी यादों के साथ उन्हें उस घर में लॉकडाउन रहने की अनुमति दे दी। फिर उस दिन के बाद से शर्मा जी के घर के खिड़की – दरवाजे खुल गए। मानो उन्होंने भी बाहर की रोशनी को अंदर आने की अनुमति दे दी।
💞 मुझे राखी बांधोगी 💞
मीना जा, जाकर सब्जी ले आ, सब्जीवाला आया है, माँ की आवाज़ कानो में पड़ी और मैं जल्दी – जल्दी माँ के दिए हुए आदेश का पालन करते हुए बाहर आयी, “भैय्या टिंडे कैस दिए, आधा किलो देना, टमाटर, धनिया, आलू, मिर्च, यह सब कितने के हुए पैसे बताओ।” मैंने पैसे देने के लिए कुछ नहीं तो तीन – चार बार कहा लेकिन सब्जीवाला था कि टस-से-मस नहीं हुआ। दिखने में तो वह शरीफ ही लग रहा था। “जी बोलिये” जी कहिए “कहकर ही बात कर रहा था, लेकिन उसकी नजर एक टक मुझे देख रही थी, जैसे देखते हुए कुछ सोच रहा हो। जब मैंने जोर से चिल्लाकर कहा ” भैया पैसे………. ” तब जैसे वो नींद से जागा हो। ” जी-जी-जी साठ रूपये हुए हैं “।” अजीब हो” कहकर उसको साठ रूपये दिए और सब्जी लेकर अंदर आ गई। उस दिन से चाहे सर्दी, गर्मी या बरसात हो, वह हमारे दरवाजे पर आकर ” सब्जी ले लो ” कहना नहीं भूलता था। जब भी मैं सब्जी लेकर मुड़ती वह उसी तरह की नज़रों से मुझे देखता। एक पल मुझे ऐसा लगा वह बदतमीज है, मेरे मन में उसके प्रति घृणा के भाव जाग गए “व साथ ही साथ उसको सबक भी सिखाना है मैंने ऐसा सोच लिया। अगले दिन रक्षा बंधन का त्योहार था। घर में चहल-पहल का माहौल था, मन आज बहुत खुश था। नए कपड़े, मिठाई, भैया से मिलने वाला तोहफा, यह सब सोचकर मन बहुत खुश हो रहा था कि अचानक “सब्जी ले लो सब्जी” की आवाज़ आई और आकर मेरे घर के सामने रुक गई। माँ ने हमेशा कि तरह “मीना जाना बेटी धनिया – मिर्च ले ले” कहा। एक पल तो मेरा मन बिल्कुल नहीं हुआ लेकिन मैंने दृढ़ निश्चय जो किया था कि उसको सबक सिखाना है, तो मैं बाहर जाकर उसके सामने गुस्से में खड़ी हो गई। मैंने मन ही मन सोचकर रखा था कि जैसे ही वो घूरेगा मैं आज जड़ दूंगी। मैंने धनिया – मिर्च लिया, लेकिन ये क्या रोज की तरह आज वो थोड़ा विचलित, अस्थिर सा नजर आ रहा था। आज उसने पैसे भी नहीं लिये, उसके हाथ कांप रहे थे। मैंने सोचा “मुझे क्या? मत लो पैसे!” और मैं जैसे ही जाने के लिए मुड़ी उसने कंप-कपाते हाथों को आगे किया और कहा “दीदी आज रक्षा बंधन है, क्या तुम मुझे राखी बांधोगी?” मैं दंग रह गई, दीदी…….. राखी………। फिर उसने बताया “मेरा नाम अमर है। मेरी एक बड़ी बहन थी जो बिल्कुल आपकी तरह दिखती थी, जो अब इस दुनिया में नहीं है, जब आपको पहली बार देखा तो मुझे ऐसा लगा कि मुझे मेरी दीदी फिर से मिल गई है। क्या आज आप मुझे राखी बांधोगी??” मैं यह सुनकर ना नहीं कर सकीं। अनजाने ही सही मुझे इस पावन त्योहार पर एक भाई और मिल गया, फिर उस दिन के बाद अमर दिखा नहीं लेकिन हर साल रक्षा बंधन पर राखी बंधावाने के लिए हाजिर हो जाता है। 🙏🙏